यह साइट खासकर के प्रैक्टिस के लिए है, इसलिए अधिकतर प्रश्नो के उत्तर नहीं दिए गए हैं| आप उत्तर देके मदद कर सकते हैं अपनी और दूसरों की भी

8. निम्नलिखित अवतरण को पढ़े और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उतर दें :भारत की दलगत राजनीति ने कई चुनौतियों का सामना किया हैं | कांग्रेस -प्रणाली ने अपना खात्मा ही नही किया बल्कि कांग्रेस के जमावड़े के बिखर जाने से आत्म -प्रतिनिधित्व की नयी प्रव्रीती का भी जोर बढ़ा | इससे दलगत व्यवस्था और विभिन्न हितों की समाई करने की इसकी क्षमता पर भी सवाल उठे | राजव्यवस्था के सामने एक महत्वपूर्ण काम एक ऐसी दलगत व्यवस्था खडी करने अथवा राजनीतिक दलों को गढने की है ,जो कारगर तरीके से विभिन्न हितों को मुखर और एकजुट करें ....(क) इस अध्याय को पढने के बाद क्या आप दलगत व्यवस्था की चुनौतियों की सूची बना सकते हैं?(ख) विभिन्न हितों का समाहार और उनमे एकजुटता का होना क्यों जरूरी है |(ग) इस अध्याय में आपने अयोध्या विवाद के बारे में पढ़ा | इस विवाद ने भारत के राजनीतिक दलों की समाहार की क्षमता के आगे क्या चुनौती पेश की ? 

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(क) इस अध्याय में दलगत व्यवस्था की निम्नलिखित चुनौतियां उभर कर सामने आती है - 1. गठबंधन राजनीति को चलाना 2. कांग्रेस के कमजोर होने से खाली हुए स्थान को भरना 3. पिछड़े वर्गों की राजनीति का उभारना 4. अयोध्या विवाद का उभारना 5. गैर-सैद्धांतिक रजनीतिक समझौते का होना 6. गुजरात दंगो सांप्रदायिक दंगे होना |(ख) विभिन्न हितो का समाहार और उनमे एकजुटता का होना जरुरी हैं, क्योंकि तभी भारत अपनी एकता और अखंडता को बनाये रखकर विकास कर सकता है |(ग) अयोध्या विवाद ने भारत के रजनीतिक दलों के सामने सांप्रदायिकता की चुनौती पेश की तथा भारत में सांप्रदायिक आधार पर रजनीतिक दलों की राजनीति बढ़ गई |

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10. निम्नलिखित अवतरण को पढ़े और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उतर दे :.....लगभग सभी नए सामाजिक आन्दोलन नयी समस्याओ जैसे-पर्यावरण का विनाश,महिलाओ की बदहाली आदिवासी संस्कृति का नाश और मानवाधिकारों का उल्लंघन .........के समाधान को रेखांकित करते हुए उभरे | इनमे से कोई भी अपनेआप में समाजव्यवस्था के मूलगामी बदलाव के सवाल से नही जुड़ा था | इस अर्थ में ये आन्दोलन अतीत की कान्तिकारी विचारधाराओ से एकदम अलग है | लेकिन ये आन्दोलन बड़ी बुरी तरह बिखरे हुए है और यही इनकी कमजोरी है ..... सामाजिक आन्दोलन का एक बड़ा  दायरा एसी चीजो की चपेट में है कि वह एक ठोस तथा एकजुट जन आन्दोलन का रूप नही ले पाता और न ही वचितो और गरीबो के लिय प्रासंगिक हो पाता है | ये आन्दोलन बिखरे-बिखरे है प्रतिक्रिया के तत्वों से भरे है अनियत हैं और बुनियादी  सामाजिक बदलाव के लिए इनके पास कोई फ्रेमवर्क नही है | इस या उस के विरोध (पश्चिम-

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