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Aapathit kavyansh(*) सागर के उर पर नाच नाच करती हैं लह। प्रधानजगती के घर को बीच सीधनिज छवि के रस से सच सी।जल कन्याएँ भोली अनजान,सागर के उर पर नाच नाच करती है लहर धरानप्रात: समीर से हो अधीर,छकर पल पल ति तीर,कुसुमावलि सी पुलकित महान,सागर के उप पर नाच नाच, करती है लहरे परगानसंध्या से पाकर शव ।।करती सी शत सर चाप ।हिलती नया तरु दल के समान,सागर क उर पर नाच नाच, करती हैं लहरे धरगानकरतल गत कर भभ की विभूति,पाकर शशि से सुषमानुभूतितारावाल सी पद दीप्तिमान,सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुरगान ।तन पर शोभित नीला दुकूलहै छिपे हदय में भाव फुलआकर्षित करती हुई ध्यान,सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधरगान । Questions:-(क) कवि ने जलकन्याएँ किसे कहा है तथा वे क्या कार्य करती हैं।(ख) प्रातः काल के समय लहरें सागर के जल पर क्या करती हुई नृत्य करती हैं?(ग) 'करती सी शत सर-चाप भांग' का आशय स्पष्ट कीजिए

0 answers asked Jun 10, 2019 by anonymous
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